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बृ॑ह॒तः परि॒ सामा॑नि ष॒ष्ठात्पञ्चाधि॒ निर्मि॑ता। बृ॒हद्बृ॑ह॒त्या निर्मि॑तं॒ कुतोऽधि॑ बृह॒ती मि॒ता ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बृहत: । परि । सामानि । षष्ठात् । पञ्च । अधि । नि:ऽमिता । बृहत् । बृहत्या: । नि:ऽमितम् । कुत :। अधि । बृहती । मिता ॥९.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:9» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्म विद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (षष्ठात्) छठे (बृहतः) बड़े [ब्रह्म] से (पञ्च) पाँच (सामानि) कर्म समाप्त करनेवाले [पाँच पृथिवी आदि भूत] (परि) सब ओर (अधि) अधिकारपूर्वक (निर्मिता) बने हैं। (बृहत्) बड़ा [जगत्] (बृहत्याः) बड़ी [विराट्, प्रकृति] से (निर्मितम्) बना है, (कुतः) कहाँ से (अधि) फिर (बृहती) बड़ी [प्रकृति] (मिता) बनी है ॥४॥
भावार्थभाषाः - पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँच तत्त्वों की अपेक्षा जो छठा ब्रह्म है, उससे वे पञ्चभूत प्रकट हुए हैं और उसी की शक्ति से वह जगत् बना है और उसी शक्तिमान् से वह शक्ति उत्पन्न हुई है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(बृहतः) प्रवृद्धाद् ब्रह्मणः (परि) सर्वतः (सामानि) सातिभ्यां मनिन्मनिणौ। उ० ४।१५३। षो अन्तकर्मणि-मनिन्। कर्मसमापकानि पृथिव्यादिभूतानि (षष्ठात्) (पञ्च) पञ्चसंख्याकानि (अधि) अधिकारे (निर्माता) रचितानि (बृहत्) प्रवृद्धं जगत् (बृहत्याः) प्रवृद्धायाः विराडाख्यायाः प्रकृतेः सकाशात् (निर्मितम्) रचितम् (कुतः) कस्मात् (अधि) (पुनः) (बृहती) महती विराट् (मिता) रचिता ॥