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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एकः) एक [सर्वव्यापक परमेश्वर] (गौः) [लोकों का] चलानेवाला, (एकः) एक (एकऋषिः) अकेला ऋषि [सन्मार्गदर्शक], (एकम्) एक [ब्रह्म] (धाम) ज्योतिःस्वरूप है, (एकधा) एक प्रकार से (आशिषः) हित प्रार्थनाएँ हैं। (पृथिव्याम्) पृथिवी पर (एकवृत्) अकेला वर्तमान (यक्षम्) पूजनीय [ब्रह्म], (एकर्तुः) एक ऋतुवाला [एकरस वर्तमान परमात्मा] [किसी से] (न अति रिच्यते) नहीं जीता जाता है ॥२६॥
भावार्थभाषाः - एक, अद्वितीय, परमेश्वर अपनी अनुपम शक्ति से सर्वशासक है, उसी की आज्ञापालन सब प्राणियों के लिये हितकारक है ॥२६॥
टिप्पणी: २६−(एकः) इण्भीकापा०। उ० ३।४३। इण् गतौ-कन्। एति प्राप्नोतीत्येकः। सर्वव्यापकः केवलः परमेश्वरः (न) निषेधे (अति रिच्यते) पराभूयते केनापि। अन्यत् पूर्ववत् म० २५ ॥
