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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कः नु) कौन सा (गौः) [लोगों का] चलानेवाला, (कः) कौन (एकऋषिः) अकेला ऋषि [सन्मानदर्शक], (उ) और (किम्) कौन (धाम) ज्योतिःस्वरूप है, और (काः) कौनसी (आशिषः) हितप्रार्थनाएँ हैं। (पृथिव्याम्) पृथिवी पर [जो] (एकवृत्) अकेला वर्तमान (यक्षम्) पूजनीय [ब्रह्म] है, (सः) वह (एकर्तुः) एक ऋतुवाला [एकरस वर्तमान] (कतमः नु) कौन सा [पुरुष है] ॥२५॥
भावार्थभाषाः - इन प्रश्नों का उत्तर अगले मन्त्र में है ॥२५॥
टिप्पणी: २५−(कः) (नु) प्रश्ने (गौः) गमेर्डोः। उ० २।६७। णिजर्थाद् गमेर्डो। गौरादित्यो भवति, गमयति रसान्, गच्छत्यन्तरिक्षे-निरु० २।१४। लोकानां गमयिता (कः) (एकऋषिः) अ० २।६।१। ऋषिः दर्शनात्-निरु० २।१। अद्वितीयसन्मार्गदर्शकः (किम्) (उ) (धाम) ज्योतिःस्वरूपम् (काः) (आशिषः) अ० २।२५।७। हितप्रार्थनाः (यक्षम्) म० ८। यज पूजायाम्-स। पूजनीयं ब्रह्म (पृथिव्याम्) भूमौ (एकवृत्) अद्वितीयवर्तमानम् (एकर्तुः) एकस्मिन् ऋतौ सदा वर्तमानः कालेनानवच्छेदात् (कतमः) सर्वेषां कः (नु) (सः) ॥
