पदार्थान्वयभाषाः - वे [ईश्वरनियम] (षट्) छह (शीतान्) शीत और (षट् उ) छह ही (उष्णान्) उष्ण (मासः) महीने (आहुः) बताते हैं, (ऋतुम्) [वह] ऋतु (नः) हमें (ब्रूत) बताओ (यतमः) जो कोई (अतिरिक्तः) भिन्न है। (सप्त) सात [वा सात वर्णवाली] (सुपर्णाः) बड़ी पालनेवाली (कवयः) गतिशील इन्द्रियाँ [वा सूर्य की किरणें] (सप्त) सात (छन्दांसि अनु) ढकनों [मस्तक के छिद्रों] के साथ (सप्त) सात (दीक्षाः) संस्कारों में (नि षेदुः) बैठी हैं ॥१७॥
भावार्थभाषाः - (कः स॒प्त खानि॒ वि त॑तर्द शी॒र्षणि॒ कर्णा॑वि॒मौ नासि॒॑के॒ चक्ष॑णी॒ मुख॑म्। येषां॑ पुरु॒त्रा विज॒यस्य॑ म॒ह्मनि॒ चतु॒ष्पादो द्वि॒पदो॒ यन्ति॒ याम॑म् ॥) अ० १०।२।६ ॥प्रजापति ने मस्तक में सात गोलक खोदे, यह दोनों कान, दो नथने, दो आँखें, और एक मुख। जिनके विजय की महिमा में चौपाये और दोपाये जीव अनेक प्रकार से मार्ग चलते हैं ॥ मस्तक में सात गोलक होने में यह अथर्ववेद १०।२।६ का प्रमाण मन्त्र है, इसका प्रमाण अ० २।१२।७ में आ चुका है। विराट्, ईश्वरशक्ति से वर्ष में द्वन्द्वसूचक शीत और उष्ण दो ऋतु हैं, अन्य ऋतुएँ इनके अन्तर्गत हैं। यह ऋतुएँ सूर्य की किरणों के तिरछे और सीधे पड़ने से होती हैं। किरणों में, शुल्क, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश और चित्र यह सात वर्ण हैं। इन किरणों का प्रभाव मस्तक के सात छिद्रों दो-दो कानों, नथनों, आँखों और एक मुख पर पड़ता है। उस से सात संस्कार, दो-दो प्रकार के श्रवण, गन्ध, दर्शन और एक कथन शक्ति उत्पन्न होकर समस्त शरीर का पालन करते हैं ॥१७॥