षड्जाता भू॒ता प्र॑थम॒जर्तस्य॒ षडु॒ सामा॑नि षड॒हं व॑हन्ति। ष॑ड्यो॒गं सीर॒मनु॒ साम॑साम॒ षडा॑हु॒र्द्यावा॑पृथि॒वीः षडु॒र्वीः ॥
पद पाठ
षट् । जाता । भूता । प्रथमऽजा । ऋतस्य । षट् । ऊं इति । सामानि । षट्ऽअहम् । वहन्ति । षट्ऽयोगम् । सीरम् । अनु । सामऽसाम । षट् । आहु: । द्यावापृथिवी: । षट् । उर्वी: ॥९.१६॥
अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:9» पर्यायः:0» मन्त्र:16
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतस्य) सत्यस्वरूप परमेश्वर के [सामर्थ्य, से] (प्रथमजा) विस्तार के साथ [वा पहिले] उत्पन्न (षट् भूता) छह इन्द्रियाँ [स्थूल त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक और मन] (जाता) प्रकट हुईं, (षट् उ) छह ही (सामानि) कर्म समाप्त करनेवाली [इन्द्रियाँ] (षडहम्) छह [इन्द्रियों] से व्याप्तिवाले [देह] को (वहन्ति) ले चलती हैं। (षड्योगम्) छह [स्पर्श, दृष्टि, श्रुति, रसना, घ्राण और मनन सूक्ष्म शक्तियों] से संयोगवाले (सीरम् अनु) बन्धन के साथ-साथ (सामसाम) प्रत्येक कर्म समाप्त करनेवाली [स्थूल इन्द्रिय है], [लोग] (षट् षट्) छह-छह [स्थूल इन्द्रियों और उनकी सूक्ष्म शक्तियों से सम्बन्धवाले] (उर्वीः) विस्तृत (द्यावापृथिवीः) प्रकाशमान और अप्रकाशमान लोकों को (आहुः) बताते हैं ॥१६॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों ने निश्चय किया है कि परमेश्वर के सामर्थ्य से स्थूल इन्द्रियाँ और उनकी सूक्ष्म शक्तियाँ उत्पन्न हुईं और उनके ही आश्रित संसार के सब पदार्थ हैं ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(षट्) षट्संख्याकानि (जाता) प्रादुर्भूतानि (भूता) म० ७। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनांसि स्थूलेन्द्रियाणि (प्रथमजा) प्रथेरमच्। उ० ५।६८। प्रथ प्रख्याने विस्तारे च-अमच्। विस्तारेण, आदौ वा जातानि (ऋतस्य) सत्यस्वरूपस्य परमात्मनः, सामर्थ्यात् इति शेषः (षट्) षट्संख्याकानीन्द्रियाणि (उ) एव (सामानि) म० ४। कर्मसमापकानीन्द्रियाणि (षडहम्) अह व्याप्तौ-घञर्थे क। षडिन्द्रियैः सह व्यापकं देहम् (वहन्ति) गमयन्ति (षड्योगम्) षडिन्द्रियाणां सूक्ष्मशक्तियुक्तम् (सीरम्) शुसिचिमीनां दीर्घश्च। उ० २।२५। षिञ् बन्धने-क्रन्, बन्धम् (अनु) अनुसृत्य (सामसाम) म० ४। प्रत्येक कर्मसमापकेन्द्रियम् (षट्) षट्स्थूलेन्द्रियसंबद्धाः (आहुः) कथयन्ति विद्वांसः (द्यावापृथिवीः) प्रकाशमानाप्रकाशमानलोकान् (षट्) षडिन्द्रियाणां सूक्ष्मसामर्थ्ययुक्ताः (उर्वीः) विस्तृताः ॥
