पदार्थान्वयभाषाः - (पञ्च) पाँच (व्युष्टीः) विविध प्रकार वास करनेवाली [तन्मात्राओं] के (अनु) साथ-साथ (पञ्च) पाँच [पृथिवी आदि पाँच भूत सम्बन्धी] (दोहाः) पूर्तिवाले पदार्थ हैं, (पञ्चनाम्नीम्) पूर्व आदि पाँच नामवाली, यद्वा पाँच ओर झुकनेवाली (गाम् अनु) दिशा के साथ-साथ (पञ्च) पाँच, (ऋतवः) ऋतुएँ हैं [अर्थात् शरद्, हेमन्त, शिशिर सहित, वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा]। (पञ्च) पाँच [पूर्वादि चार और एक ऊपरवाली] (दिशः) दिशाएँ (पञ्चदशेन) [पाँच प्राण अर्थात् प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान+पाँच इन्द्रिय अर्थात् श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना, और घ्राण+पाँच भूत अर्थात् भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन] पन्द्रह पदार्थवाले जीवात्मा के साथ (क्लृप्ताः) समर्थ की गई हैं, (ताः) वे (एकमूर्ध्नीः) एक [परमेश्वर रूप] मस्तकवाली [दिशायें] (एकम्) एक (लोकम् अभि) देश की ओर [वर्तमान हैं] ॥१५॥
भावार्थभाषाः - उसी परमात्मा की शक्ति से पञ्चभूत, ऋतुएँ और दिशाएँ आदि जीवों के सुख के लिये उत्पन्न हुए हैं ॥१५॥ पाँच ऋतुओं के लिये देखो-अ० ८।२।२२ और निरु० ४।२७ ॥