इ॒यमे॒व सा या प्र॑थ॒मा व्यौच्छ॑दा॒स्वित॑रासु चरति॒ प्रवि॑ष्टा। म॒हान्तो॑ अस्यां महि॒मानो॑ अ॒न्तर्व॒धूर्जि॑गाय नव॒गज्जनि॑त्री ॥
पद पाठ
इयम् । एव । सा । या । प्रथमा । विऽऔच्छत् । आसु । इतरासु । चरति । प्रऽविष्टा । महान्त: । अस्याम् । महिमान: । अन्त: । वधू: । जिगाय । नवऽगत् । जनित्री ॥९.११॥
अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:9» पर्यायः:0» मन्त्र:11
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इयम् एव) यही (सा) यह ईश्वरी, [विराट्, ईश्वरशक्ति] है, (या) जो (प्रथमा) प्रथम (व्यौच्छत्) प्रकाशमान हुई है, और (आसु) इन सब और (इतरासु) दूसरी [सृष्टियों] में (प्रविष्टा) प्रविष्ट होकर (चरति) विचरती है। (अस्याम् अन्तः) इसके भीतर (महान्तः) बड़ी-बड़ी (महिमानः) महिमाएँ हैं, उस (नवगत्) नवीन-नवीन गतिवाली (वधूः) प्राप्तियोग्य (जनित्री) जननी ने [अनर्थों को] (जिगाय) जीत लिया है ॥११॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरशक्ति की महिमाओं को अनुभव करके विद्वान् लोग विघ्नों का नाश करते हैं ॥११॥ यह मन्त्र आचुका है-अ० ३।१०।४ ॥
टिप्पणी: ११−(इयम्) परिदृश्यमाना विराट् (एव) (सा) ईश्वरी (या) विराट्। अन्यत् पूर्ववत्-अ० ३।१०।४ ॥
