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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इमे) ये (मृत्युपाशाः) मृत्यु के जाल (उप्ताः) फैले हैं, (यान्) जिनमें (आक्रम्य) पाँव धरकर [हे शत्रु !] (न मुच्यसे) तू नहीं छूटता है। (इदम्) यह (कूटम्) फन्दा (अमुष्याः सेनायाः) उस सेना का (सहस्रशः) सहस्रों प्रकार से (हन्तु) हनन करे ॥१६॥
भावार्थभाषाः - राजा शत्रु लोगों को दृढ़ बन्धनों में रखकर विनष्ट करे ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(इमे) सर्वत्र व्याप्ताः (उप्ताः) डुवप बीजसन्ताने-क्त। विस्तृताः (मृत्युपाशाः) मरणबन्धाः (यान्) (आक्रम्य) पादेन प्राप्य (न) निषेधे (मुच्यसे) मुक्तो भवसि (अमुष्याः) तस्याः (हन्तु) हननं करोतु (सेनायाः) (इदम्) (कूटम्) कूट परितापे-अच्। बन्धनयन्त्रम् (सहस्रशः) म० १। बहुप्रकारेण ॥
