पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (साध्याः) साध्य लोग [परोपकरसाधक जन] (एकम्) एक (जालदण्डम्) जाल के दण्डे को, (रुद्राः) रुद्र [शत्रुनाशक लोग] (एकम्) एक को, (वसवः) वसु लोग [उत्तम पुरुष] (एकम्) एक को (ओजसा) बल से (उद्यत्य) उठाकर (यन्ति) चलते हैं, (एकः) एक (आदित्यैः) पूर्णविद्यावालों करके (उद्यतः) उठाया गया है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - जिस राजा के अधिकार में उत्तम-उत्तम अधिकारी होते हैं, वहाँ विजय होती है ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(साध्याः) अ० ७।५।१। साधवः। परोपकारसाधकाः (एकम्) (जालदण्डम्) प्रबन्धरूपं जालसाधनम् (उद्यत्य) उत्+यम यमने−ल्यप्। उद्युज्य (यन्ति) गच्छन्ति (ओजसा) बलेन (रुद्राः) अ० २।२७।६। रु वधे-क्विप्, तुक्+रु वधे-ड। शत्रुनाशकाः (एकम्) (वसवः) अ० १।९।१। प्रशस्ता जनाः (एकम्) (आदित्यैः) अ० १।९।१। आदीप्यमानैः। पूर्णविद्यैः (एकः) जालदण्डः (उद्यतः) यम-क्त। ऊर्ध्वीकृतः ॥
