पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग के विनाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रचेतसः मम) मुझ बड़े ज्ञानी के (वचसः) वचन की (मेदिनीः) प्रीति करनेवाली [ओषधियाँ] (इह) यहाँ (आ यन्तु) आवें। (यथा) जिससे (इमम् पुरुषम्) इस पुरुष को (दुरितात्) कष्ट से (अधि) यथावत् (पारयामसि) हम पार लगावें ॥७॥
भावार्थभाषाः - पूर्वदर्शी वैद्य यथावत् वार्तालाप करके युक्त ओषधियों द्वारा क्लेश मिटावें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(इह) अत्र (आ यन्तु) आगच्छन्तु (प्रचेतसः) प्रकृष्टज्ञानयुक्तस्य (मेदिनीः) ञिमिदा स्नेहने-अच्, मेद-इनि, ङीप्। स्नेहवत्यः। ओषधयः (वचसः) वचनस्य (मम) (यथा) (इमम्) (पारयामसि) तारयामः (पुरुषम्) (दुरितात्) कष्टात् (अधि) अधिकृत्य ॥
