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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग के विनाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अथो) अव (त्वा) तुझको (पञ्चशलात्) पञ्चभूतों में व्यापक (उत) और (दशशलात्) दश दिशाओं में व्यापक परमेश्वर का आश्रय लेकर (अथो) और (यमस्य) न्यायकारी राजा के (पड्वीशात्) बेड़ी डालने से (उत) और (विश्वस्मात्) सब (देवकिल्बिषात्) परमेश्वर के प्रति अपराध से [पृथक्] करके (उत् अहार्षम्) मैंने ऊँचा पहुँचाया है ॥२८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सर्वव्यापक परमेश्वर का आश्रय लेकर सब दुराचार को छोड़कर उन्नति करें ॥२८॥ इस मन्त्र का उत्तर भाग आ चुका है-अ० ६।९६।२। तथा ७।११२।२ ॥
टिप्पणी: २८−(उत्) ऊर्ध्वम् (त्वा) त्वाम् (अहार्षम्) प्रापितवानस्मि (पञ्चशलात्) शल गतौ-अच्। पञ्चमीविधाने ल्यब्लोपे कर्मण्युपसंख्यानम्। वा० पा० २।३।२८। पञ्चसु भूतेषु व्यापकं परमेश्वरमाश्रित्य (अथो) इदानीम् (दशशलात्) पूर्ववत् पञ्चमी। दशदिक्षु व्यापकं परमेश्वरमाश्रित्य (उत) अपि च। अन्यत्पूर्ववत्-अ० ६।९६।२। तथा ७।११२।२ ॥
