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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग के विनाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पुष्पवतीः) पुष्प रखनेवाली, (प्रसूमतीः) सुन्दर कोंपलवाली, (फलिनीः) फलवाली (उत) और (अफलाः) फलरहित [ओषधियाँ] (संमातरः इव) संमिलित माताओं के समान (अस्मै) इस [पुरुष] को (अरिष्टतातये) कुशल करने के लिये (दुह्राम्) दूध देवें ॥२७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सब प्रकार की ओषधियों से उपकार लेकर स्वस्थ रहें ॥२७॥
टिप्पणी: २७−(पुष्पवतीः) प्रशस्तपुष्पयुक्ताः (प्रसूमतीः) कोमलपल्लववत्यः (फलिनीः) उत्तमफलवत्यः (उत) अपि च (संमातरः इव) सम्मिलितजनन्यो यथा (दुह्राम्) दुहन्तु। दुग्धं ददतु (अस्मै) मनुष्याय (अरिष्टतातये) अ० ३।५।५। क्षेमकरणाय ॥
