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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग के विनाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [अश्वत्थः] वीरों के ठहरने का स्थान, पीपल का वृक्ष, (दर्भः) दुःखविदारक, कुश वा कांस का बिरवा, (वीरुधाम्) ओषधियों का (राजा) राजा (सोमः) सोमलता (अमृतम्) अमृत [बलकर] (हविः) ग्राह्य द्रव्य है। (भेषजौ) भयनिवारक (व्रीहिः) चावल (च) और (यवः) जौ दोनों (दिवः) उन्माद वा पीड़ा के (पुत्रौ) शोधनेवाले (अमर्त्यौ) अमर [पुष्टिकारक] हैं ॥२०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य पीपल, दर्भ, सोमलता, चावल, जौ आदि पदार्थों के गुणों को यथावत् जानें ॥२०॥
टिप्पणी: २०−(अश्वत्थः) अ० ३।६।१। अश्वा वीरास्तिष्ठन्ति यत्र स अश्वत्थः पिप्पलवृक्षः (दर्भः) अ० ६।४३।१। दुःखविदारकः कुशः काशो वा (वीरुधाम्) ओषधीनाम् (सोमः) सोमलता (राजा) (अमृतम्) सर्वगुणोपेतम् (हविः) ग्राह्यं द्रव्यम् (व्रीहिः) अ० ६।१४०।२। आशुधान्यम् (यवः) धान्यविशेषः (च) (भेषजौ) भयनिवारकौ (दिवः) दिवु क्रीडामदादिषु यद्वा दिव अर्दे-क्विप् डिवि वा। उन्मादस्य। पीडनस्य (पुत्रौ) अ० १।११।५। पुनातीति पुत्रः। शोधकौ (अमर्त्यौ) अमरणधर्माणौ। नित्यबलकरौ ॥
