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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग के विनाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जो (आङ्गिरसीः) ऋषियों करके बतलाई गई (पर्वतेषु) पर्वतों पर (च) और (समेषु) चौरस ठौरों में (रोहन्ति) उगती हैं, (ताः) वे (पयस्वतीः) दूधवाली, (शिवाः) कल्याणि (ओषधीः) ओषधियाँ (नः) हमारे (हृदे) हृदय के लिये (शम्) शान्तिदायक (सन्तु) होवें ॥१७॥
भावार्थभाषाः - वैद्य लोग शास्त्रोक्त ओषधियों को दूर और समीप स्थानों से लाकर संसार में नीरोगता करें ॥१७॥
टिप्पणी: १७−(याः) (रोहन्ति) उद्भवन्ति (आङ्गिरसीः) अ० ८।५।९। ऋषिभिः प्रोक्ताः (पर्वतेषु) (शैलेषु) (समेषु) साधुस्थानेषु (च) (ताः) (नः) अस्माकम् (पयस्वतीः) दुग्धवत्यः (शिवाः) कल्याण्यः (ओषधीः) तापनाशका अन्नादिपदार्थाः (सन्तु) (शम्) शान्ताः (हृदे) हृदयाय ॥
