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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग के विनाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मुमचानाः) [रोग से] छुड़ानेवाली (ओषधयः) ओषधियाँ (वैश्वानरात्) सब नरों की हितकारक (अग्नेः) अग्नि [सर्वव्यापक परमेश्वर] का आश्रय लेकर (अधि) अधिकारपूर्वक (भूमिम्) भूमि को (सन्तन्वतीः) ढाँकती हुयी तुम (इत) चलो, (यासाम्) जिनका (राजा) राजा (वनस्पतिः) सेवनीय पदार्थों का स्वामी [सोम रस है] ॥१६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर के उत्पन्न किये पदार्थों से यथावत् उपयोग लेवें ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(मुमुचानाः) रोगात्मोचयित्र्यः (ओषधयः) (अग्नेः) अ० ८।२।२७। अग्निं सर्वव्यापकं परमेश्वरमाश्रित्य (वैश्वानरात्) सर्वनरहितमित्यर्थः (अधि) अधिकृत्य (भूमिम्) (सन्तन्वतीः) आच्छादयन्त्यः (यासाम्) ओषधीनाम् (राजा) (वनस्पतिः) अ० १।१२।३। वननीयानां सेवनीयानां पदार्थानां स्वामी। सोमः सोसरसः ॥
