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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग के विनाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यावतीः) जितनी (च) और (कियतीः) कितनी [विविध परिमाण और गुणवाली] (इमाः) ये (ओषधीः) ओषधियाँ (पृथिव्याम् अधि) पृथिवी के ऊपर [हैं]। (सहस्रपर्ण्यः) सहस्रों पोषणवाली (ताः) वे सब (मा) मुझको (मृत्योः) मरण [आलस्य] से और (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥१३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अन्न आदि ओषधियों द्वारा बल बढ़ाकर सुखी होवें ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(यावतीः) यत्परिमाणयुक्ताः (कियतीः) बहुगुणोपेता इत्यर्थः (इमाः) (पृथिव्याम्) भूमौ (अधि) उपरि (ओषधीः) (ताः) (मा) माम् (सहस्रपर्ण्यः) धापॄवस्य०। उ० ३।६। पॄ पालनपूरणयोः-न प्रत्ययः। बहुपालनोपेताः (मृत्योः) मरणात्। आलस्यात् (मुञ्चन्तु) मोचयन्तु (अंहसः) आहननात् कष्टात् ॥
