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यस्त्वा॑ स्व॒पन्तीं॒ त्सर॑ति॒ यस्त्वा॒ दिप्स॑ति॒ जाग्र॑तीम्। छा॒यामि॑व॒ प्र तान्त्सूर्यः॑ परि॒क्राम॑न्ननीनशत् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

य: । त्वा । स्वपन्तीम् । त्सरति । य: । त्वा । दिप्सति । जाग्रतीम् । छायाम्ऽइव । प्र । तान् । सूर्य: । परिऽक्रामन् । अनीनशत् ॥६.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:6» पर्यायः:0» मन्त्र:8


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गर्भ की रक्षा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो कोई (त्वा) तुझ (स्वपन्तीम्) सोती हुई को (त्सरति) छलता है, (यः) जो (त्वा) तुझ (जाग्रतीम्) जागती हुई को (दिप्सति) मारना चाहता है। (परिक्रामन्) घूमते हुए (सूर्यः) सूर्य [समान पुरुष] ने (तान्) उन सबको (छायाम् इव) छाया के समान (प्र अनीनशत्) नाश कर दिया है ॥८॥
भावार्थभाषाः - सावधान पति आदि सोती और जागती गर्भिणी के पास से दुष्टों को ऐसे हटावें, जैसे परिक्रमा करता हुआ सूर्य अन्धकार को ॥८॥ मन्त्र ७ तथा ८ का मिलान करो-ऋग्वेद १०।१६२।५, ६ ॥
टिप्पणी: ८−(यः) (त्वा) त्वाम् (स्वपत्नीम्) निद्रावतीम् (त्सरति) त्सर छद्मगतौ। कपटेन प्राप्नोति (यः) (त्वा) (दिप्सति) अ० ४।३६।१। हन्तुमिच्छति (जाग्रतीम्) प्रबुद्धाम् (छायाम्) अन्धकारम् (इव) यथा (तान्) सर्वान् (सूर्यः) (परिक्रामन्) आकाशे परिभ्रमन् (अनीनशत्) नाशितवान् ॥