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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गर्भ की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (दुर्णामा) दुर्नाम [कठिन रोग] (च) और (सुनामा) सुनाम [स्वस्थपन] (च) भी (उभा) दोनों (संवृतम्) समीप रहना (इच्छतः) चाहते हैं। (अरायान्) अलक्ष्मीवाले [रोगों] को (अप हन्मः) हम मिटाते हैं, (सुनामा) सुनाम [स्वस्थपन] (स्रैणम्) स्त्री सम्बन्धी [शरीर] को (इच्छताम्) चाहे ॥४॥
भावार्थभाषाः - वैद्य समीपवर्ती रोग के कारणों को रोककर गर्भिणी का स्वास्थ्य बढ़ाते रहें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(दुर्णामा) म० १। दुष्टरोगः (च) (सुनामा) सुभगः। स्वस्थभावः (च) (उभा) द्वौ (संवृतम्) वृतु वर्तने-क्विप्। समीपवर्तनम् (इच्छतः) (अरायान्) अ० २।२५।३। अलक्ष्मीकान् रोगान् (अप हन्मः) विनाशयामः (सुनामा) (स्रैणम्) स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवनात्। पा० ४।१।८७। स्त्री-नञ्। स्त्रीसम्बन्धि शरीरम् (इच्छताम्) आत्मनेपदं छान्दसम्। इच्छत् ॥
