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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गर्भ की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो [कीड़े] (आमम्) कच्चे (मांसम्) मांस को (च) और (ये) जो (पौरुषेयम्) पुरुष के (क्रविः) मांस को (अदन्ति) खाते हैं। (केशवाः) और क्लेश पहुँचानेवाले [रोग वा कीड़े] (गर्भान्) गर्भों को (खादन्ति) खाते हैं। (तान्) उन सबको (इतः) यहाँ से (नाशयामसि) हम नाश करते हैं ॥२३॥
भावार्थभाषाः - वैद्य लोग रोगजनक कीड़ों और रोगों को गर्भिणी स्त्री से अलग करें ॥२३॥
टिप्पणी: २३−(ये) क्रमयः (आमम्) अपक्वम् (मांसम्) आमिषम् (अदन्ति) (पौरुषेयम्) अ० ७।१२५।१। पुरुषस्य सम्बन्धि (च) (ये) (क्रविः) अ० ८।३।१५। मांसम् (गर्भान्) उदरस्थबालकान् (खादन्ति) भक्षयन्ति। नाशयन्ति (केशवाः) क्लिशेरन् लो लोपश्च। उ० ५।३३। क्लिशू विबाधने अन्, ललोपः+वह प्रापणे-ड। क्लेशस्य वाहकाः प्रापकाः क्रमयो रोगा वा (तान्) सर्वान् (इतः) अस्मात् (नाशयामसि) ॥
