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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गर्भ की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे स्त्री !] (परिसृष्टम्) सब प्रकार युक्त [कर्म] [तुझे] (धारयतु) धारण करे, (यत्) जो (हितम्) हित है, (तत्) वह (मा अव पादि) न गिर जावे। (उग्रौ) दोनों नित्य सम्बन्धवाले, (नीविभार्यौ) नीति [नियम] से धारण करने योग्य, (भेषजौ) भय जीतनेवाले [बल और पराक्रम, अर्थात् शारीरिक और आत्मिक सामर्थ्य] (ते) तेरे (गर्भम्) गर्भ की (रक्षताम्) रक्षा करें ॥२०॥
भावार्थभाषाः - गर्भिणी समुचित कर्म से शारीरिक और आत्मिक बल बढ़ा कर गर्भरक्षा करे ॥२०॥
टिप्पणी: २०−(परिसृष्टम्) सृज विसर्गे-क्त। सर्वतो युक्तं कर्म (धारयतु) दधातु−त्वामिति शेषः (यत्) गर्भरूपं वस्तु (हितम्) अभिमतम् (मा अव पादि) अवपन्नं विस्रस्तं मा भूत् (तत्) (गर्भम्) (ते) तव (उग्रौ) ऋज्रेन्द्राग्रवज्र०। उ० २।२८। उच समवाये-रन्नन्तो निपातः। समवेतौ (रक्षताम्) (भेषजौ) भयजेतारौ। बलपराक्रमौ (नीविभार्यौ) अ० ८।२।१६। वृदृभ्यां विन्। उ० ४।५३। णीञ् प्रापणे-विन्+भृञ् धारणे−ण्यत्। नीव्या नीत्या नियमेन धारणीयौ ॥
