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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गर्भ की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे स्त्री !] (यः) जो (ते) तेरे (गर्भम्) गर्भ को (प्रति मृशात्) दबा देवे, (वा) अथवा (ते) तेरे (जातम्) उत्पन्न [बालक] को (मारयाति) मार डाले। (उग्रधन्वा) प्रचण्ड धनुष् वाला (पिङ्गः) पराक्रमी पुरुष (तम्) उसको (हृदयाविधम्) हृदय में बरमे [से छेद] वाला (कृणोतु) करे ॥१८॥
भावार्थभाषाः - राजा भ्रूणहत्यारे और बालहत्यारे की छाती में वर्मा चला कर नष्ट कर देवे ॥१८॥
टिप्पणी: १८−(यः) घातकः (ते) तव (गर्भम्) भ्रूणम् (प्रतिमृशात्) प्रतिकूलं मृशेत्। स्पृशेत्। पीडयेत् (जातम्) उत्पन्नं बालकम् (वा) अथवा (मारयाति) मारयेत् (पिङ्गः) म० ६। पराक्रमी राजा (उग्रधन्वा) प्रचण्डचापः (कृणोतु) करोतु (हृदयाविधम्) आङ्+व्यध ताडने-घञर्थे क। हृदये आविधः काष्ठादिवेधनसाधनं सूच्याकाराग्रमस्त्रं यस्य तम्। आविधेन हृदये छिन्नम् ॥
