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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गर्भ की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो [कीड़े अपने] (आत्मानम्) आत्मा को (अंसे) पीड़ा देने में (अतिमात्रम्) अत्यन्त (आधाय) लगाकर (बिभ्रति) रखते हैं। और (स्त्रीणाम्) स्त्रियों के (श्रोणिप्रतोदिनः) कटिभाग में व्यथा करनेवाले हैं, (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष ! [उन] [रक्षांसि] राक्षसों को (नाशय) नष्ट कर दे ॥१३॥
भावार्थभाषाः - वैद्य लोग गर्भिणी स्त्रियों के दुःखदायी कीड़ों और रोगों को नाश करें ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(ये) क्रिमयो रोगा वा (आत्मानम्) मनः (अतिमात्रम्) यथा तथा। अत्यर्थम् (अंसे) अमेः सन्। उ० ५।२१। अम पीडने-सन्। पीडने (आधाय) समन्ताद्धृत्वा (बिभ्रति) धरन्ति (स्त्रीणाम्) गर्भिणीनाम् (श्रोणिप्रतोदिनः) वहिश्रिश्रुयुद्रु०। उ० ४।५१। श्रु गतौ भ्वा०-नि+प्रतुद व्यथने णिनि। कटिभागपीडकान् (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् वैद्य (रक्षांसि) तान् दुःखदायिनः (नाशय) घातय ॥
