पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
हिंसा के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (स्राक्त्येन) उद्योगशील (मणिना) मणि [श्रेष्ठ नियम] द्वारा (मनीषिणा) महाबुद्धिमान् (ऋषिणा इव) ऋषि के साथ होकर जैसे मैंने (सर्वाः) सब (पृतनाः) सेनाओं को (अजैषम्) जीत लिया है, मैं (मृधः) हिंसक (रक्षसः) राक्षसों को (वि हन्मि) नाश करता हूँ ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य ऋषियों के समान पहिले से नियम धारण करके सब उपद्रवों को हटावें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(स्राक्त्येन) म० ४। उद्योगशीलेन (मणिना) म० १। श्रेष्ठनियमेन (मणिन ऋषिणा) ऋत्यकः। पा० ६।१।१२८। प्रकृतिभावत्वं ह्रस्वत्वं च (ऋषिणा) अ० २।६।१। अतीन्द्रियार्थद्रष्ट्रा (इव) यथा (मनीषिणा) म० ३। विपश्चिता (अजैषम्) जितवानस्मि (सर्वाः) (पृतनाः) अ० ३।२१।३। शत्रुसेनाः (वि) विशेषेण (मृधः) हिंसकान् (हन्मि) घातयामि (रक्षसः) राक्षसान् ॥
