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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
हिंसा के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (जनाः) जन (स्राक्त्यम्)) उद्योगशील (मणिम्) मणि [श्रेष्ठ नियम] को (वर्माणि) कवच (कृण्वते) बनाते हैं। [उनके समान] (वशी) वश में करनेवाला पुरुष, (सूर्य इव) सूर्य के समान (दिवम्) आकाश में (आरुह्य) चढ़कर, (कृत्याः) हिंसाओं को (वि बाधते) हटा देता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष संयमी पुरुषों के समान जितेन्द्रिय होते हैं, वे बड़े यशस्वी होकर निर्विघ्न रहते हैं ॥७॥
टिप्पणी: ७−(ये) (स्राक्त्यम्) म० ४। उद्योगिनम् (मणिम्) म० १। श्रेष्ठनियमम् (जनाः) लोकाः (कृण्वते) कुर्वते (सूर्य इव) (दिवम्) आकाशम् (आरुह्य) अधिष्ठाय (वि) विशेषेण (कृत्याः) हिंसाः (बाधते) निवारयति (वशी) वशयिता पुरुषः ॥
