देवता: कृत्यादूषणम् अथवा मन्त्रोक्ताः
ऋषि: शुक्रः
छन्द: त्रिपदा विराड्गायत्री
स्वर: प्रतिसरमणि सूक्त
0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
हिंसा के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह [प्रसिद्ध वेदरूप] (मणिः) मणि [उत्तम नियम], (सपत्नहा) प्रतियोगियों का नाश करनेवाला, (सुवीरः) बड़े वीरोंवाला, (सहस्वान्) महाबली (वाजी) पराक्रमी, (सहमानः) [शत्रुओं का] हरानेवाला, (उग्रः) तेजस्वी (वीरः) वीर होकर (कृत्याः) हिंसाओं को (दूषयन्) नाश करता हुआ (प्रत्यक्) सन्मुख (एति) चलता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - पराक्रमी वीर पुरुष वैदिक नियमों को धारण करके विघ्नों को हटाते हुए आगे बढ़ते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २−(सुवीरः) शोभनैर्वीरैर्युक्तः (सहस्वान्) बलवान् (वाजी) पराक्रमी (सहमानः) शत्रूणामभिभविता (उग्रः) प्रचण्डः (प्रत्यक्) अभिमुखम्। सम्मुखम् (कृत्याः) अ० ४।९।५। हिंसाः। विघ्नान् (दूषयन्) खण्डयन् (एति) गच्छति। अन्यद् गतम्-म० १ ॥
