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वर्म॑ मे॒ द्यावा॑पृथि॒वी वर्माह॒र्वर्म॒ सूर्यः॑। वर्म॑ म॒ इन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॒ वर्म॑ धा॒ता द॑धातु मे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वर्म । मे । द्यावापृथिवी इति । वर्म । अह:। वर्म । सूर्य: । वर्म । मे । इन्द्र: । च । अग्नि: । च । वर्म । धाता । दधातु । मे ॥५.१८॥

अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:18


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

हिंसा के नाश का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (मे) मेरे लिये (द्यावापृथिवी) आकाश और भूमि (वर्म) कवच, (अहः) दिन (वर्म) कवच, (सूर्यः) सूर्य (वर्म) कवच (मे) मेरे लिये (इन्द्रः) वायु (च) और (अग्निः) अग्नि [जाठर अग्नि] (च) भी (वर्म) कवच [होवे], (धाता) पोषण करनेवाला परमेश्वर (मे) मेरे लिये (वर्म) कवच (दधातु) धारण करे ॥१८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर की महिमा को विचार कर संसार के सब पदार्थों से उपकार लेकर सदा उन्नति करे ॥१८॥ इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध-अ० १९।२–०।४। में भी है ॥
टिप्पणी: १८−(वर्म) कवचम्। रक्षासाधनं भवतु (मे) मह्यम् (द्यावापृथिवी) आकाशभूमी (अहः) दिनम् (सूर्यः) आदित्यः (इन्द्रः) वायुः (च) (अग्निः) जाठराग्निः (च) अपि (धाता) पोषकः परमेश्वरः (दधातु) धारयतु। अन्यद्गतम् ॥