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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
हिंसा के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एनम्) उस पुरुष को (न) न तो (अप्सरसः) अप्सराएँ [आकाश में चलनेवाली बिजुलियाँ], (न) न (गन्धर्वाः) गन्धर्व [पृथिवी धारण करनेवाले मेघ] और (न) न (मर्त्याः) मनुष्य (घ्नन्ति) मारते हैं। वह (सर्वाः) सब (दिशः) दिशाओं पर (वि राजति) शासन करता है, (यः) जो (इमम्) इस [वेद रूप] (मणिम्) मणि [श्रेष्ठ नियम] को (बिभर्ति) रखता है ॥१३॥
भावार्थभाषाः - आत्मज्ञानी पुरुषार्थी पुरुष विज्ञान द्वारा सर्वत्र राज्य करता है ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(न) निषेधे (एनम्) आत्मज्ञानिनम् (घ्नन्ति) मारयन्ति (अप्सरसः) अ० ४।७।२। आकाशे सरणशीला विद्युतः (न) (गन्धर्वाः) अ० २।१।२। पृथिवीधारका मेघाः (न) (मर्त्याः) मनुष्याः (सर्वाः) (दिशः) (वि राजति) विविधं शास्ति। अन्यत् पूर्ववत्-म० १२ ॥
