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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
हिंसा के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह पुरुष (इत्) ही (व्याघ्रः) बाघ, (अथो) और भी (सिंहः) सिंह, (अथो) और भी (वृषा) बलीवर्द [समान बलवान्] (अथो) और भी (सपत्नकर्शनः) अत्रुओं को दुर्बल करनेवाला (भवति) होता है, (यः) जो (इमम्) इस [वेदरूप] (मणिम्) मणि [श्रेष्ठ नियम] को (बिभर्ति) रखता है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - वेदानुगामी पुरुष सब प्रकार शक्तिमान् होकर शत्रुओं का नाश करते हैं ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(सः) पुरुषः (इत्) एव (व्याघ्रः) व्याघ्र इव शक्तिमान् (भवति) (अथो) अपि च (सिंहः) सिंह इव (वृषा) बलीवर्द इव (अथो) (सपत्नकर्शनः) कृश तनूकरणे-ल्युट्। शत्रूणां दुर्बलकरः (यः) (बिभर्ति) धरति (इमम्) प्रसिद्धं वेदरूपम् (मणिम्) म० १। श्रेष्ठनियमम् ॥
