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ये पा॑कशं॒सं वि॒हर॑न्त॒ एवै॒र्ये वा॑ भ॒द्रं दू॒षय॑न्ति स्व॒धाभिः॑। अह॑ये वा॒ तान्प्र॒ददा॑तु॒ सोम॒ आ वा॑ दधातु॒ निरृ॑तेरु॒पस्थे॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ये । पाकऽशंसम् । विऽहरन्ते । एवै: । ये । वा । भद्रम् । दूषयन्ति । स्वधाभि: । अहये । वा । तान् । प्रऽददातु । सोम: । आ । वा । दधातु । नि:ऽऋते: । उपऽस्थे ॥४.९॥

अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:9


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और मन्त्री के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो [दुष्ट] (एवैः) शीघ्रगामी [पुरुषार्थी] पुरुषों के साथ [वर्तमान] (पाकशंसम्) दृढ़ स्तुतिवाले पुरुष को (विहरन्ते) विशेष करके नष्ट करते हैं, (वा) अथवा (स्वधाभिः) आत्मधारणाओं के साथ [रहनेवाले] (भद्रम्) कल्याण को (दूषयन्ति) दूषित करते हैं। (सोमः) ऐश्वर्यवान् राजा (वा) अवश्य (तान्) उन्हें (अहये) सर्प [समान क्रूर पुरुष] को (प्र ददातु) दे देवे, (वा) अथवा (निर्ऋतेः) अलक्ष्मी की (उपस्थे) गोद में (आ दधातु) रख देवे ॥९॥
भावार्थभाषाः - जो कोई पाखण्डी उपकारी सज्जनों के कामों में बाधा डालें, राजा उनको वधक आदि से मरवा डाले अथवा निर्धन कर देवे ॥९॥
टिप्पणी: ९−ऐश्वर्यवान् प्रेरको वा राजा (आ) समन्तात् (दधातु) स्थापयतु (निर्ऋतेः) अ० २।१०।१। कृच्छ्रापत्तेः। अलक्ष्म्याः (उपस्थे) उत्सङ्गे ॥