163 बार पढ़ा गया
यो मा॒ पाके॑न॒ मन॑सा॒ चर॑न्तमभि॒चष्टे॒ अनृ॑तेभि॒र्वचो॑भिः। आप॑ इव काशिना॒ संगृभीता॒ अस॑न्न॒स्त्वास॑त इन्द्र व॒क्ता ॥
पद पाठ
य: । मा । पाकेन । मनसा । चरन्तम् । अभिऽचष्टे । अनृतेभि: । वच:ऽभि: । आप:ऽइव । काशिना । सम्ऽगृभीता: । असन् । अस्तु । असत: । इन्द्र । वक्ता ॥४.८॥
अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:8
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और मन्त्री के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [दुराचारी] (पाकेन) परिपक्व [दृढ़] (मनसा) मन से (चरन्तम्) विचरते हुए (मा) मुझ को (अनृतेभिः) असत्य (वचोभिः) वचनों से (अभिचष्टे) झिड़कता है। (इन्द्र) हे परम ऐश्वर्यवाले राजन् ! (काशिना) मुट्ठी में (संगृभीताः) लिये हुए (आपः इव) जल के समान, [वह] (असतः) असत्य का (वक्ता) बोलनेवाला (असन्) अविद्यमान (अस्तु) हो जावे ॥८॥
भावार्थभाषाः - राजा मिथ्यावादी लोगों को इस प्रकार नष्ट कर देवे, जैसे मुट्ठी में बाँधा हुआ जल वा वायु बिखर जाता है ॥८॥
