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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और मन्त्री के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रति चक्ष्व) प्रत्येक को देख, (वि चक्ष्व) विविध प्रकार देख, (इन्द्रः) हे सूर्य [समान राजन् !] (च) और (सोम) हे चन्द्र [समान मन्त्री !] (जागृतम्) तुम दोनों जागो। (रक्षोभ्यः) राक्षसों पर (वधम्) मारू हथियार और (यातुमद्भ्यः) पीड़ा स्वभाववालों पर (अशनिम्) वज्र (अस्यतम्) चलाओ ॥२५॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार राजा और मन्त्री सुनीति से शत्रुओं का नाश करके प्रजापालन करते हैं, वैसे ही आचार्य शिष्य, पति-पत्नी, पिता-पुत्र आदि सुविद्या से आत्मदोष नाश करके आनन्दित हों ॥२५॥ इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: २५−(प्रति) प्रत्येकम् (चक्ष्व) पश्य (वि) विविधम् (चक्ष्व) (इन्द्रः) हे सूर्यवत्तेजस्विन् राजन् (च) (सोम) हे चन्द्रवच्छान्तिस्वभाव मन्त्रिन् (जागृतम्) अनिद्रौ भवतम् (रक्षोभ्यः) दुष्टेभ्यः (वधम्) मारकमायुधम् (अस्यतम्) प्रक्षिपतम् (अशनिम्) वज्रम् (यातुमद्भ्यः) पीडास्वभावेभ्यः ॥
