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उलू॑कयातुं शुशु॒लूक॑यातुं ज॒हि श्वया॑तुमु॒त कोक॑यातुम्। सु॑प॒र्णया॑तुमु॒त गृध्र॑यातुं दृ॒षदे॑व॒ प्र मृ॑ण॒ रक्ष॑ इन्द्र ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उलूकऽयातुम् । शुशुलूकऽयातुम् । ‍ जहि । श्वऽयातुम् । उत । कोकऽयातुम् । सुपर्णऽयातुम् । उत । गृध्रऽयातुम् । दृषदाऽइव । प्र । मृण । रक्ष: । इन्द्र ॥४.२२॥

अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:22


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और मन्त्री के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे प्रतापी राजन् ! (उलूकयातुम्) उल्लू के समान झपटनेवाले, (शुशुलूकयातुम्) बड़े अचेत के समान दुःखदायी, (श्वयातुम्) कुत्ते समान पीड़ा देनेवाले (उत) और (कोकयातुम्) भेड़िया समान हिंसा करनेवाले, (सुपर्णयातुम्) श्येन पक्षी समान शीघ्र चलनेवाले (उत) और (गृध्रयातुम्) गिद्ध समान दूर पहुँचनेवाले [उपद्रवी] को (जहि) मार और (दृषदा इव) जैसे शिला से (रक्षः) राक्षस को (प्र मृण) नाश कर दे ॥२२॥
भावार्थभाषाः - नीतिकुशल राजा विविध प्रकार के उपद्रवियों को नाश करता रहे ॥२२॥
टिप्पणी: २२−(उलूकयातुम्) उलूकादयश्च। उ० ४।४१। वल संवरणे-ऊक। कमिमनिजनि०। उ० १।७३। या प्रापणे गतौ च−तु। उलूकवद् गन्तारम् (शुशुलूकयातुम्) उलूकादयश्च। उ० ४।४१। सु+शुर मारणे स्तम्भे च-ऊक। सस्य शः, रस्य लः। यत ताडने-उण्। अचैतन्यपुरुषवत्पीडकम् (जहि) मारय (श्वयातुम्) म० २०। कुक्कुरसमानपीडकम् (उत) अपि च (कोकयातुम्) कुक आदाने-अच्। वृकवत्पीडकम् (सुपर्णयातुम्) श्येनवच्छीघ्रगामिनम् (उत) (गृध्रयातुम्) गृध्रवद्दूरगन्तारम् (प्र) प्रकर्षेण (मृण) नाशय (रक्षः) राक्षसम् (इन्द्र) प्रतापिन् राजन् ॥