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उ॒भोभ॑यावि॒न्नुप॑ धेहि॒ दंष्ट्रौ॑ हिं॒स्रः शिशा॒नोऽव॑रं॒ परं॑ च। उ॒तान्तरि॑क्षे॒ परि॑ याह्यग्ने॒ जम्भैः॒ सं धे॑ह्य॒भि या॑तु॒धाना॑न् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उभा । उभयाविन् । उप । धेहि । दंष्ट्रौ । हिंस्र: । शिशान: । अवरम् । परम् । च । उत । अन्तरिक्षे । परि। याहि । अग्ने । जम्भै: । सम् । धेहि । अभि । यातुऽधानान् ॥३.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:3


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (उभयाविन्) हे पूर्ति की रक्षा करनेवाले ! तू [शत्रुओं का] (हिंस्रः) नाश करनेवाला और (शिशानः) तीक्ष्ण होकर (अवरम्) नीचे के (च) और (परम्) ऊपर के (उभा) दोनों (दंष्ट्रौ) दाँतों को (उप धेहि) काम में ला। (उत) और (अग्ने) हे अग्नि [समान प्रतापी राजन् !] (अन्तरिक्षे) आकाश में [विमान से हमारे] (परि) आस-पास (याहि) विचर, (यातुधानान् अभि) दुःखदायी दुर्जनों पर (जम्भैः) दाँतों [दँतीले तेज हथियारों] से (सम् धेहि) लक्ष्य कर [वेध ले] ॥३॥
भावार्थभाषाः - राजा दुर्जनों को इस प्रकार दबाकर रक्खे, जैसे दाँतों के बीच वस्तु को दबा लेते हैं और आकाशमार्ग से सावधानी रखकर दुष्टों का नाश करे ॥३॥
टिप्पणी: ३−(उभा) द्वौ (उभयाविन्) वलिमलितनिभ्यः कयन्। उ० ४।९९। उभ पूर्तौ-कयन्। सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये। पा० ३।२।७८। उभय+अव रक्षणे-णिनि। हे पूर्तिरक्षक (उप धेहि) उपयोगय (दंष्ट्रौ) दन्तौ (हिंस्रः) शत्रुनाशकः (शिशानः) म० १। तीक्ष्णीकृतः (अवरम्) अधोवर्तमानं दंष्ट्रम् (परम्) उपरि वर्तमानम् (च) (उत) अपि (अन्तरिक्षे) आकाशे विमानेन (परि) सर्वतः (याहि) संचर (अग्ने) अग्निवत्तेजस्विन् राजन् (जम्भैः) जभि नाशने-घञ्। नाशकर्मभिः। दन्तयुक्तायुधैः (सन्धेहि) लक्ष्यीकुरु (अभि) अभिलक्ष्य (यातुधानान्) पीडादायकान् ॥