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अ॒ग्नी रक्षां॑सि सेधति शु॒क्रशो॑चि॒रम॑र्त्यः। शुचिः॑ पाव॒क ईड्यः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्नि: । रक्षांसि । सेधति । शुक्रऽशोचि: । अमर्त्य । शुचि: । पावक: । ईड्य: ॥३.२६॥

अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:26


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (शुक्रशोचिः) शुद्धतेजवाला, (अमर्त्यः) अमर, (शुचिः) पवित्र, (पावकः) शुद्ध करनेवाला, (ईड्यः) स्तुति योग्य वा खोजने योग्य (अग्निः) अग्नि [समान तेजस्वी सेनापति] (रक्षांसि) दुष्टों को (सेधति) शासन में रखता है ॥२६॥
भावार्थभाषाः - प्रतापी, अमर अर्थात् शूर वीर पराक्रमी शुद्धाचरणी राजा दुष्टों को जीतकर कीर्ति पावे ॥२६॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है−७।१५।१० ॥
टिप्पणी: २६−(अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी सेनाधीशः (रक्षांसि) दुष्टान् (सेधति) षिधु शासने। शास्ति (शुक्रशोचिः) शुद्धतेजाः (अमर्त्यः) अमरणधर्मा। महापुरुषार्थी (शुचिः) पवित्रः (पावकः) संशोधकः (ईड्यः) स्तुत्यः। अन्वेषणीयः ॥