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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्य) हे बल के हितकारी ! (अग्ने) तेजस्वी सेनापति ! (पुरम्) दुर्गरूप, (विप्रम्) बुद्धिमान्, (धृषद्वर्णम्) अभयस्वभाव, (भङ्गुरावतः) नाश कर्मवाले [कपटी] के (हन्तारम्) नाश करनेवाले (त्वा) तुझको (दिवेदिवे) प्रतिदिन (वयम्) हम (परि धीमहि) परिधि बनाते हैं ॥२२॥
भावार्थभाषाः - प्रजागण शूर वीर सेनापति पर विश्वास करके शत्रुओं के नाश करने में उससे सहायता लेवें ॥२२॥ यह मन्त्र आचुका है-अ० ७।७१।१ ॥
टिप्पणी: २२-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ७।७१।१ ॥
