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नृ॒चक्षा॒ रक्षः॒ परि॑ पश्य वि॒क्षु तस्य॒ त्रीणि॒ प्रति॑ शृणी॒ह्यग्रा॑। तस्या॑ग्ने पृ॒ष्टीर्हर॑सा शृणीहि त्रे॒धा मूलं॑ यातु॒धान॑स्य वृश्च ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नृऽचक्षा: । रक्ष: । परि । पश्य । विक्षु । तस्य । त्रीणि । प्रति । शृणीहि । अग्रा । तस्य । अग्ने । पृष्टी: । हरसा । शृणीहि । त्रेधा । मूलम् । यातुऽधानस्य । वृश्च ॥३.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (नृचक्षाः) मनुष्यों पर दृष्टि रखनेवाला तू (रक्षः) राक्षस को (विक्षु) मनुष्यों के बीच (परि पश्य) जाँच कर देख, (तस्य) उसके (त्रीणि) तीन (अग्रा) अग्रभाग [मस्तक और दो कंधे] (प्रति शृणीहि) तरेड़ दे। (अग्ने) हे अग्नि [समान तेजस्वी राजन् !] (तस्य) उसकी (पृष्टीः) पसलियाँ (हरसा) बल से (शृणीहि) कुचल डाल, (यातुधानस्य) दुःखदायी की (मूलम्) जड़ को (त्रेधा) तीन प्रकार से [दोनों जङ्घा और कटिभाग से] (वृश्च) काट दे ॥१०॥
भावार्थभाषाः - राजा उपद्रवियों को दण्ड देने में सदा कठोरहृदय रहे ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(नृचक्षाः) नॄणां द्रष्टा (रक्षः) दुष्टम् (परि) सर्वतः (पश्य) अवलोकय (विक्षु) मनुष्येषु। विशो मनुष्याः-निघ० २।३। (तस्य) (त्रीणि) त्रिसंख्याकानि (प्रति) प्रत्यक्षम् (शृणीहि) नाशय (अग्रा) अग्राणि। शिरः स्कन्धद्वयं च (तस्य) (अग्ने) (पृष्टीः) पार्श्वास्थीनि (शृणीहि) (त्रेधा) त्रिप्रकारेण। जङ्घाद्वयं कटिभागं च (मूलम्) शरीरस्य नीचभागम् (यातुधानस्य) (वृश्च) छिन्धि ॥