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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कल्याण की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह [जीव] (जीवतु) जीता रहे (मा मृत) न मरे, (इमम्) इस [जीव] को (सम् ईरयामसि) हम वायुसमान [शीघ्र] चलाते हैं। (अस्मै) इस के लिये मैं (भेषजम्) औषध (कृणोमि) करता हूँ (मृत्यो) हे मृत्यु ! (पुरुषम्) [इस] पुरुष को (मा वधीः) मत मार ॥५॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुषार्थी निरालसी होकर धर्म में वायुसमान शीघ्र चलते हैं, वे अमर मनुष्य दुःख में नहीं फँसते ॥५॥
टिप्पणी: ५−(अयम्) जीवः (जीवतु) प्राणान् धरतु (मा मृत) मृङ् प्राणत्यागे-लुङ्। प्राणान् मा त्यजतु (इमम्) आत्मानम् (समीरयामसि) वायुवच्छीघ्रं प्रेरयामः (कृणोमि) करोमि (अस्मै) जीवाय (भेषजम्) औषधम् (मृत्यो) (पुरुषम्) जीवम् (मा वधीः) मा जहि ॥
