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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कल्याण की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] तू (अग्नेः) अग्नि [तेज] का (शरीरम्) शरीर, (पारयिष्णु) पार लगानेवाला (असि) है, और (रक्षोहा) राक्षसों का नाश करनेवाला, और (सपत्नहा) प्रतियोगियों को मार डालनेवाला (असि) है। (अथो) और भी (अमीवचातनः) पीड़ा मिटानेवाला (पूतुद्रुः) शुद्धि पहुँचानेवाला (नाम) नाम का (भेषजम्) औषध है ॥२८॥
भावार्थभाषाः - यह मन्त्र इस सूक्त का उपसंहार है। मनुष्य तेजःस्वरूप परमात्मा की उपासना से अपने क्लेशों का नाश करें ॥२८॥ इति प्रथमोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: २८−(अग्नेः) तेजसः (शरीरम्) स्वरूपम् (असि) (पारयिष्णु) अ० ५।२८।१४। पारप्रापकं ब्रह्म (रक्षोहा) रक्षसां हन्ता परमेश्वरः (सपत्नहा) प्रतियोगिनां नाशकः (अथो) अपि च (अमीवचातनः) अ० १।२८।१। रोगनाशकः (पूतुद्रुः) अर्तेश्च तुः। उ० १।७२। पूङ् शोधने-तु, स च कित्। हरिमितयोर्द्रुवः। उ० १।३४। पूतु+द्रु गतौ-कु, स च डित्। शुद्धिप्रापकः परमेश्वरः (नाम) प्रसिद्धौ (भेषजम्) औषधम् ॥
