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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कल्याण की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सर्वः) सब (वै) ही (तत्र) वहाँ (जीवति) जीता रहता है, (गौः) गौ, (अश्वः) घोड़ा, (पुरुषः) पुरुष, और (पशुः) पशु [हाथी ऊँट आदि]। (यत्र) जहाँ पर (इदम्) यह [प्रसिद्ध] (ब्रह्म) ब्रह्म [परमेश्वर] (जीवनाय) जीवन के लिये (कम्) सुख से (परिधिः) कोट [समान रक्षासाधन] (क्रियते) बनाया जाता है ॥२५॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य ब्रह्म के आश्रित रहते हैं, वे जीवन्मुक्त होकर सब सुख भोगते हैं ॥२५॥ इस मन्त्र का सम्बन्ध मन्त्र २३, २४ से है ॥
टिप्पणी: २५−(सर्वः) निःशेषः (वै) एव (तत्र) ब्रह्माश्रये (जीवति) प्राणान् धारयति (गौः) धेनुः (अश्वः) घोटकः (पुरुषः) मनुष्यः (पशुः) गजोष्ट्रादिः (तत्र) (इदम्) प्रसिद्धम् (ब्रह्म) परिवृढः परमात्मा (परिधिः) प्राकारो यथा रक्षासाधनम् (जीवनाय) प्राणधारणाय (कम्) सुखेन ॥
