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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कल्याण की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अरिष्ट) हे निर्हानि ! (सः) सो तू (न) नहीं (मरिष्यसि) मरेगा, तू (न) नहीं (मरिष्यसि) मरेगा, (मा बिभेः) मत भय कर। (तत्र) वहाँ पर [कोई] (वै) भी (न) नहीं (म्रियन्ते) मरते हैं, (नो) और नहीं (अधमम्) नीचे (तमः) अन्धकार में (यन्ति) जाते हैं ॥२४॥
भावार्थभाषाः - जहाँ पर मनुष्य ब्रह्म का विचार करते रहते हैं [देखो मन्त्र २५], वहाँ मृत्यु का भय नहीं होता ॥२४॥
टिप्पणी: २४−(सः) स त्वम् (अरिष्ट) हे निर्हाने (न) निषेधे (मरिष्यसि) प्राणान् त्यक्ष्यसि (न) (मरिष्यसि) (मा बिभेः) भीतिं मा कुरु (न) (वै) अवश्यम् (तत्र) ब्रह्मणि-मन्त्र २५ (म्रियन्ते) प्राणान् त्यजन्ति (नो) नैव (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (अधमम्) नीचीनम् (तमः) अन्धकारम् ॥
