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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कल्याण की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वप्ता) नापित तू (मर्चयता) [केशों का] पकड़नेवाले (सुतेजसा) बड़े तेज (यत्) जिस (क्षुरेण) छुरा से (केशश्मश्रु) केश और और डाढ़ी-मूँछ को (वपसि) बनाता है, [उससे] (नः) हमारे (शुभम्) सुन्दर (मुखम्) मुख और (आयुः) जीवन को (मा प्र मोषीः) मत घटा ॥१७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य केशछेदन कराके मुख और जीवन की शोभा बढ़ावें ॥१७॥ यह मन्त्र कुछ भेद से स्वामिदयानन्दकृतसंस्कारविधि चूड़ाकर्म प्रकरण में आया है ॥
टिप्पणी: १७−(यत्) येन (क्षुरेण) क्षौरास्त्रेण (मर्चयता) मर्च शब्दे ग्रहणे च-शतृ। केशानां ग्रहीत्रा (सुतेजसा) सुतीक्ष्णेन (वप्ता) टुवप बीजसन्ताने मुण्डने च-तृन्। केशच्छेत्ता। नापितः (वपसि) मुण्डयसि। छिनत्सि (केशश्मश्रु) क्लिशेरन् लो लोपश्च। उ० ५।३३। क्लिश उपतापे, क्लिशू विबाधने-अन्, लस्य लोपः। इति केशः कचः। श्मश्रु यथा-अ० ५, १९।२। शिरोरोमाणि मुखरोमाणि च (शुभम्) शोभनम् (मुखम्) (नः) अस्माकम् (आयुः) जीवनम् (मा प्र मोषीः) मा प्रहिंसीः ॥
