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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) विस्तार करनेवाला [ब्रह्म] (एवम्) इस प्रकार (यस्मै विदुषे) जिस विद्वान् को (अलाबुना) न डूबनेवाले कर्म से (अभिषिञ्चेत्) सब प्रकार सींचें, वह [विद्वान्] [विष को] (प्रत्याहन्यात्) हटा देवे ॥१॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् मनुष्य ब्रह्म को जानकर दोषों का नाश करे। इस मन्त्र में [विष] पद का अनुकर्षण मन्त्र ३ में से है ॥१॥
टिप्पणी: १−(तत्) तनोतीति तत्। तनु विस्तारे-क्विप्। गमः क्वौ। पा० ६।४।४०। गमादीनामिति वक्तव्यम्, वार्तिकम्। मलोपः, तुक्। विस्तारकं ब्रह्म (एवम्) अनेन प्रकारेण (यस्मै विदुषे) सुपां सुपो भवन्तीति वक्तव्यम्। वा० पा० ७।१।३९। द्वितीयार्थे चतुर्थी। यं विद्वांसम् (अलाबुना) पर्यायः ५ म० १४। न+लबि अवस्रंसने-उण्। अनधःपतनशीलेन कर्मणा (अभिषिञ्चेत्) अभितः सिञ्चेत् वर्धयेत् (प्रत्याहन्यात्) प्रतिरुन्ध्यात्-विषमिति शेषः म० ३ ॥
