पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (गन्धर्वाप्सरसः) गन्धर्व और अप्सर लोग [इन्द्रिय रखनेवाले और प्राण द्वारा चलनेवाले जीव] (तम्) उस (पुण्यम्) पवित्र (गन्धम्) ज्ञान का (उप जीवन्ति) सहारा लेकर जीते हैं, वह (पुण्यगन्धिः) पवित्र ज्ञानवाला [पुरुष] [दूसरों का] (उप जीवनीयः) आश्रय (भवति) होता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - सब प्राणी ईश्वरशक्ति से ही जीते हैं, ऐसा ज्ञानी पुरुष परोपकारी होता है ॥८॥
टिप्पणी: ८−(तम्) पूर्वोक्तम् (गन्धर्वाप्सरसः) म० ५। इन्द्रियधारकाः प्राणैः सह च सरणशीला जीवाः (पुण्यगन्धिः) अ० ४।५।३। पवित्रज्ञानयुक्तः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
