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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ताम्) उस [विराट्] को (सौर्यवर्चसः) सूर्य का प्रकाश जाननेवाले (वसुरुचिः) वसु [सबके निवास परमेश्वर] में रुचिवाले [जीव] ने (अधोक्) दुहा है, (ताम् एव) उससे ही (पुण्यम्) पवित्र (गन्धम्) ज्ञान को (अधोक्) दुहा है ॥७॥
भावार्थभाषाः - विज्ञानी पुरुष ईश्वरशक्ति से अनेक ज्ञान प्राप्त करता है ॥७॥
टिप्पणी: ७−(ताम्) विराजम् (वसुरुचिः) वसौ सर्वनिवासे जगदीश्वरे रुचिः प्रीतिर्यस्य स जीवः (गन्धम्) गन्ध गतिहिंसायाचनेषु-अच्। बोधम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
