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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सौर्यवर्चसः) सूर्य का प्रकाश जाननेवाला (चित्ररथः) विचित्र रमणीय गुणोंवाला [जीव] (तस्याः) उसका (वत्सः) उपदेष्टा और (पुष्करपर्णम्) पुष्टि का पूर्ण करनेवाला ब्रह्म (पात्रम्) रक्षासाधन (आसीत्) था ॥६॥
भावार्थभाषाः - सूर्य आदि लोकों की विद्या जाननेवाला पुरुष परमेश्वरशक्ति का व्याख्यान करता है ॥६॥
टिप्पणी: ६−(चित्ररथः) विचित्ररमणीयगुणो जीवः (सौर्यवर्चसः) तदधीते तद्वेद। पा० ४।२।५६। सूर्यवर्चस्-अण्। सूर्यस्य प्रकाशवेत्ता (पुष्करपर्णम्) पुषः कित्। उ० ४।४। पुष पोषणे-करन्। धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। पॄ पालनपूरणयोः-न। पुष्टिपूरकं ब्रह्म। अन्यत् पूर्ववत् ॥
