0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सर्पाः) सर्प (तद् विषम्) उस विष का (उप जीवन्ति) आश्रय लेकर जीते हैं, वह पुरुष (उपजीवनीयः) [दूसरों का] आश्रय (भवति) होता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - दुष्टों की दुष्टता जाननेवाला पुरुष शिष्टों का आश्रयणीय होता है ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(सर्पाः) भुजङ्गाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
