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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वैशालेयः) विशाला [प्रवेशशक्ति ब्रह्मविद्या] का जाननेवाला (तक्षकः) सूक्ष्मदर्शी [वा विश्वकर्मा पुरुष] (तस्याः) उस [विराट्] का (वत्सः) उपदेष्टा और (अलाबुपात्रम्) न डूबनेवाला रक्षक [ब्रह्म] (पात्रम्) रक्षासाधन (आसीत्) था ॥१४॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मज्ञानी सूक्ष्मदर्शी पुरुष ईश्वरशक्ति का प्रभाव जानते हैं ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(तस्याः) विराजः (तक्षकः) क्वुन् शिल्पिसंज्ञयोरपूर्वस्यापि। उ० २।३३। तक्षू तनूकरणे-क्वुन्। तनूकर्ता। सूक्ष्मदर्शी विश्वकर्मा पुरुषः (वैशालेयः) तमिविशिविडि०। उ० १।११८। विश प्रवेशने-कालन्, टाप्। स्त्रीभ्यो ढक्। पा० ४।१।१२०। विशाला-ढक्। तदधीते तद्वेद। पा० ४।२।५९। इत्यर्थे। प्रवेशशक्तेर्विशालाया ब्रह्मविद्याया वेत्ता (अलाबुपात्रम्) कृवापा०। उ० १।१। न+लबि अवस्रंसने-उण्। नलोपः। नञि लम्बेर्नलोपश्च। उ० १।८७। अत्र तु ऊ प्रत्ययः स्त्रियाम्। अनधःपतनशीलरक्षकं ब्रह्म। अन्यत् पूर्ववत् ॥
