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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ी, (सा) वह (सर्पान्) सर्पों में (आ अगच्छत्) आयी, (ताम्) उसको (सर्पाः) सापों ने (उप अह्वयन्त) पास बुलाया,(विषवति) हे विषैली ! (आ इहि) तू आ, (इति) बस ॥१३॥
भावार्थभाषाः - उस विराट् ईश्वरशक्ति के प्रभाव से सर्प आदि जीव अपने कर्मफल द्वारा विषधारी होते हैं ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(सर्पान्) भुजङ्गमान् (विषवति) हे विषयुक्ते। अन्यत् पूर्ववत् ॥
