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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इतरजनाः) दूसरे लोग (ताम्) उस (तिरोधाम्) अन्तर्धान शक्ति का (उप जीवन्ति) आश्रय लेकर जीते हैं, वह पुरुष (सर्वम्) सब (पाप्मानम्) पाप को (तिरो धत्ते) तिरस्कार करता है, और [दूसरों का] (उपजीवनीयः) आश्रय (भवति) होता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - अज्ञानी लोग भी ईश्वरशक्ति को मानते हैं, ऐसा श्रद्धावान् पुरुष अपने पाप नाश करके सर्वमाननीय होता है ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(ताम्) विराजम् (इतरजनाः) म० ९। अन्ये। पामराः (तिरोधत्ते) तिरस्कृत्य धरति (पाप्मानम्) अ० ३।३१।१। पापम्। अन्यत्पूर्ववत् ॥
