0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ी, (सा) वा (देवान्) विजय चाहनेवाले पुरुषों में (आ अगच्छत्) आयी, (ताम्) उसको (देवाः) विजय चाहनेवालों ने (उप अह्वयन्त) पास बुलाया,(ऊर्जे) हे बलवती ! (आ इहि) तू आ, (इति) बस ॥१॥
भावार्थभाषाः - जितेन्द्रिय विजयी पुरुष ईश्वरमहिमा में आनन्द पाते हैं ॥१॥
टिप्पणी: १−(देवान्) विजिगीषून् (देवाः) विजिगीषवः (ऊर्जे) पर्यायः २ म० ४। हे बलवति। शिष्टं पूर्ववत् ॥
